2 स्ट्रोक इंजन क्या है ? और कैसे कार्य करते है

2 स्ट्रोक इंजन

 

हेलो दोस्तों स्वागत है आप सभी का एक और नयी पोस्ट में आज हम जानेंगे 2 स्ट्रोक इंजन के बारे में तो चलिए देर न करते हुए जानते हैं

2 स्ट्रोक इंजन 

दोस्तों मोटर गाडी में इंटर्नल cumbustion इंजन फोर स्ट्रोक के आलावा एक एक और सिद्धांत है । जिसे 2 स्ट्रोक साइकिल सिद्धांत कहते हैं । आपको बता दें कि फोर स्ट्रोक इंजन के अविष्कार के बहुत समय बाद

लगभग 1980 में 2 स्ट्रोक इंजन का अविष्कार सर डुगाल्ट क्लार्क ने किया । इस सिस्टम इंजन को चलने के चारों स्ट्रोक (suction स्ट्रोक, कम्प्रेशन स्ट्रोक, पावर स्ट्रोक, एग्जॉस्ट स्ट्रोक ) पिस्टन के सिर्फ दो ही स्ट्रोकों में पूरे हो जाते हैं ।

और क्रैंक शाफ़्ट के हर एक चक्कर में इंजन को पावर प्राप्त होती है । इन इंजनों में वाल्वों का उपयोग इनलेट और एग्जॉस्ट के लिए नहीं किया जाता है । बल्कि वाल्वों का कार्य सिलेंडर की दीवारों में बने तीन पोर्टों  के द्वारा होता है ।

फोर स्ट्रोक इंजन क्या है । और कैसे कार्य करता hai

जो निम्नलिखित हैं

1 . इनलेट पोर्ट

2 . एग्जॉस्ट पोर्ट

3 . ट्रांसफर पोर्ट

ये पोर्ट कलैंडर में पिस्टन के ऊपर से नीचे तथा नीचे से ऊपर चलने पर क्रमशः शुल्टे पर बंद होते हैं । 2 स्ट्रोक इंजन में क्रैंक केस एयर बनाया जाता है । फ्यूल मिश्रण सबसे पहले क्रैंक केस में ही आता है ।

और कुछ हद तक इसी स्थान में दबाया जाता है । और वर्तमान में  इस तरह के कुछ इंजनों में एक अलग सिलेंडर का उपयोग किया जाता है । इसमें कम्प्रेशन से पूर्व फ्यूल मिश्रण भी पहुंचता है ।

इसके आलावा अतरिक्त सुपर चार्जर का भी प्रयोग करके अधिक से अधिक मिश्रण को सिलेंडर के अन्दर पहुँचाने की वयस्था रहती है जब पिस्टन सिलैंडर में नीचे B.D.C से ऊपर T.D.C तक चलता है ।

तो उस स्ट्रोक में वह सक्शन स्ट्रोक और कम्प्रेशन स्ट्रोक को एक साथ पूरा कर देता है । और जब इंजन में फ्यूल जलने पर फायरिंग होती है तो और पिस्टन धक्के से नीचे B.D.C तक जाता है । तो बचे दो स्ट्रोक पावर स्ट्रोक और एग्जॉस्ट स्ट्रोक पूरे हो जाते हैं ।

External combustion इंजन क्या है?और कार्यप्रणाली

टू स्ट्रोक engine कैसे कार्य करता है ?

 

पहला स्ट्रोक : सक्शन और कम्प्रैशन   इस वयस्था में पिस्टन नीचे B.D.C से ऊपर T.D.C तक चलता है । पिस्टन के ऊपर जाने से इनलेट पोर्ट खुल जाता है । इससे क्रैंक केस में खली स्थान बन जाता है ।

और इस स्थान को भरने के लिया फ्यूल मिश्रण क्रैंक केस में भर जाता है । इस प्रकार सक्शन स्ट्रोक का कार्य पूरा हो जाता है । पिस्टन के ऊपर पहुँचाने से पिस्टन के ऊपर सिलेंडर में ट्रांसफर पोर्ट द्वारा आया मिश्रण कंबस्चन चैम्बर में भी डाब जाता है ।

क्यूंकि ट्रांसफर पोर्ट और एग्जॉस्ट पोर्ट पिस्टन द्वारा बंद हो जाते हैं और मिश्रण को निकलने का कोई मार्ग नहीं रह जाता है । इस प्रकार पिस्टन के उसी स्ट्रोक में कम्प्रेशन स्ट्रोक का कार्य पूरा हो जाता है ।

 

दूसरा स्ट्रोक पावर और एग्जॉस्ट – इसमें कंबस्शन चैम्बर में दबे हुए मिश्रण को जलाया जाता है मिश्रण के जलते ही गैसें फ़ैल जाती हैं । और पिस्टन को धक्का लगता है और ये धक्का पिस्टन को पावर से धकेलता है

जिससे पिस्टन क्रैंक शाफ़्ट और फ्लाई व्हील को घुमा देता है । और इंजन को पावर प्राप्त होती है इस समय पिस्टन T.D.C से B.D.C को चलता है । और अपना पावर स्ट्रोक पूरा करता है ।

तथा पिस्टन के B.D.C को जाने पर एग्जॉस्ट पोर्ट खुल जाता है । और जाली हुई गैसें साइलेंसर के माधयम से बाहर निकल जाती हैं । और इंजन साइकिल का आखिरी स्ट्रोक भी उसी स्ट्रोक में पूरा हो जाता है ।

तथा ठीक इसी समय एग्जॉस्ट पोर्ट के ठीक सामने बना ट्रांसफर पोर्ट भी खुल जाता है । तथा पिस्टन के नीचे आने से क्रैंक केस के मिश्रण पर दबाव पड़ता है । और यह मिश्रण खुले हुए ट्रांसफर पोर्ट के द्वारा इंजन की अगली साइकिल के लिए सिलेंडर में आ जाता है ।

टू स्ट्रोक इंजन के क्या फायदे हैं ?

  • इस प्रकार के इंजन में क्रैंक शाफ़्ट के प्रति चक्कर में एक पावर स्ट्रोक होता है । टू स्ट्रोक इंजन में स्ट्रोक और गति के चार स्ट्रोक इंजन की अपेक्षा दुगनी पावर मिलती है ।
  • इस प्रकार के इंजनों में मेंटिनेंस कम होता है । क्यूंकि इसमें कम स्पेयर पार्ट्स की आवयश्कता होती है । 
  • इन इंजनों में क्रैंक शाफ़्ट के घूमने की गति सामान होती है । इसका कारण है कि प्रति चक्कर में पावर स्ट्रोक होता है । इसमें हल्का फ्लाईव्हील लगाकर इंजन को स्थिर किया जाता है ।
  • ये बनावट में हल्का बनाया जा सकता है । जिससे ये कम जगह घेरे इस प्रकार के इंजन का प्रयोग हल्के वाहनों में किया जाता है । 
  • टू स्ट्रोक इंजन की बनावट सरल होती है । इसमें वाल्व नहीं होते हैं । और साथ ही पोर्ट पिस्टन के अप डाउन करने से ही खुलते हैं । 

टू स्ट्रोक इंजन की कुछ असुविधाएं

  • इस प्रकार के इंजनों में नॉइस अधिक होती है । 
  • टू स्ट्रोक इंजन के मूविंग पार्ट्स जल्दी घिसकर ख़राब होते हैं । 
  • टू स्ट्रोक इंजन जल्दी गर्म हो जाते हैं । क्यूंकि प्रत्येक स्ट्रोक में फायरिंग होती रहती है । और इसमें इंजन को ठंडा रखने के लिए केवल एयर कूलिंग ही रहती है । 
  • टू स्ट्रोक में फ्रेश फ्यूल का मिश्रण कुछ हद तक जली हुई गैसों के संपर्क से निष्क्रिय होता है । 
  • इन इंजनों में ईंधन की अधिक हानि होती है । इस प्रकार की समस्या से बचने के लिए प्रायः इन इंजनों में डिफ्लेक्टेड टाइप के पिस्टन का प्रयोग किया जाता है इस प्रकार के हैड पर बेफ़िल बना रहता है । जिससे टकराकर कुछ मिश्रण सिलेंडर के एग्जॉस्ट पोर्ट से निकलकर रूक जाता है । 

इस प्रकार के इंजनों के सिलेंडर में कहीं कहीं एक ही वाल्व का प्रयोग किया जाता है । जिसे कम्प्रेशन रिलीज वाल्व कहते हैं । इस वाल्व को खोलकर ओवरफ्लो हो जाने पर उसे साफ़ किया जाता है 

 

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