सेल्फ स्टार्टर क्या है ? और कैसे काम करता है

सेल्फ स्टार्टर

हेलो दोस्तों स्वागत है आप सभी का एक और नयी पोस्ट में आज हम जानेंगे कि गाडी में सेल्फ स्टार्टर क्या होता है । और ये किस प्रकार से कार्य करता है । और ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में इसकी क्या उपयोगिता है । तो चलिए विस्तार से जानते हैं कि सेल्फ स्टार्टर क्या है । और ये किस प्रकार से कार्य करता है

सेल्फ स्टार्टर क्या है ?

क्या आप जानते हैं कि एक इंजन को शुरू होने के लिए जरूरी है । इंजन में लगी क्रैंक शाफ़्ट घूमे जब इंजन में लगी क्रैंक शाफ़्ट घूमती है । तो इंजन स्टार्ट होता है ।

जिससे पिस्टन इंजन में अपने स्ट्रोक पूरे करते हैं । अब जरूरी है इंजन में लगी क्रैंक शाफ़्ट को घुमाना इसके लिए गाडी में सेल्फ स्टार्टर का प्रयोग किया जाता है ।

पहले के समय में गाड़ियों में क्रैंक शाफ़्ट को घुमाने के लिए ड्राइविंग पुल्ली के सिरे पर डॉग नट लगाया जाता था तथा इसी डॉग नट में एक हैंडल फंसाकर क्रैंक को घुमाया जाता था ।

पर आज के बदलते दौर में क्रैंक शाफ़्ट को घुमाने के लिए D.C मोटर का प्रयोग किया जाता है । जिसे सेल्फ स्टार्टर के नाम से जाना जाता है । ये बैटरी से पावर लेता है ।

और और इंजन को यांत्रिक शक्ति देता है । इसे इंजन के पिछले भाग में लगाया जाता है । कि इसका कुछ हिस्सा फ्लाईव्हील में  मैं मूविंग रहे और इसे शुरू करने के लिए इस मोटर की पिनियन फ्लाईव्हील के ऊपर चढ़े रिंग गियर से मिलकर क्रैंक शाफ़्ट को घुमा सके इस सेल्फ स्टार्टर के प्रयोग से पावर नहीं लगानी पड़ती है । और इंजन को शुरू करने में सरलता होती है ।

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self starter की बनावट कैसी होती है ?

चलिए अब जानते हैं । सेल्फ स्टार्टर की बनावट के बारे में । सेल्फ स्टार्टर की बनावट लगभग डायनेमो के जैसे ही होती है । इसमें भी आर्मेचर पोल  शू  कंप्यूटेरर बुश का प्रयोग किया जाता है ।

इनमें फील्ड कोइल और आर्मेचर वाइंडिंग ताम्बे के इंसुलेटेड मोठे तार की अथवा ताम्बे की पतली पत्तियों की होती है । इसमें सीरीस वाउन्ड का प्रयोग किया जाता है ।

आप सभी अच्छे से जानते हैं कि क्रैंक शाफ़्ट को घुमाने के लिए पावर की जरूरत होती है ।  इसके लिए सेल्फ स्टार्टर में वाइंडिंग का प्रयोग किया जाता है । ये वाइंडिंग इस तरह की होती है ।

जिसमें रेजिस्टेंस बहुत कम रह जाती है । और करंट अधिक प्राप्त किया जाता है । जिससे सेल्फ स्टार्टर की पावर क्रैंक शाफ़्ट को घुमाने में समर्थ रहता है ।  ये करंट 450 से 550 एम्पियर तक होता है ।

  जिसके कारण ये जल्दी गर्म हो जाता है । इसलिए इसे लगभग 25 सेकेंड से ज्यादा नहीं घुमाना चाहिए । क्यूंकि वाइंडिंग जलने का खतरा रहता है । सेल्फ स्टार्टर में चार बुशों का प्रयोग किया जाता है ।

और ये बुश ताम्बे और ग्रेफाइड को मिलाकर बनाये जाते हैं । बाकी सभी भाग डायनेमो के समान ही होते हैं । केवल आर्मेचर शाफ़्ट को कुछ लम्बा रखा जाता है । क्यूंकि इसमें पिनियन का प्रयोग किया जाता है । जो कि मूविंग होकर फ्लाईव्हील को घुमाता है ।

 

 

 

सेल्फ स्टार्टर का सिद्धांत क्या है ?

जैसा कि आपको पता होगा कि जब  जब कोई कंडक्टर को करंट प्रवाहित होने वाले चुम्बक में रखते हैं । तो उस कंडक्टर में एक यांत्रिक बल उत्पन्न होता है ।

सेल्फ स्टार्टर इसी सिद्धांत पर कार्य करता है ।  जब कंडक्टर में यांत्रिक बल उत्पन्न होता है । तो ये यांत्रिक बल उसे घुमाता है । ये चुंबकीय बल फ्लेमिंग के दाएं हाथ वाले बल से पता चलती है ।

 

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सेल्फ स्टार्टर कैसे काम करता है ?

चलिए अब जानते हैं कि सेल्फ स्टार्टर कैसे काम करता है । आप सभी अच्छे से जानते हैं कि मोटर गाडी की बैटरी में दो टर्मिनल का प्रयोग किया जाता है । एक पॉजिटिव टर्मिनल होता है ।

ओर एक नेगेटिव टर्मिनल होता है । जिनमें पॉजिटिव टर्मिनल को  सेल्फ स्टार्टर से एक केबल द्वारा जोड़ा जाता है । ओर वहीँ नेगेटिव टर्मिनल को गाडी के चेसिस पर अर्थ किया जाता है ।

पॉजिटिव टर्मिनल में एक स्विच का प्रयोग किया जाता है । जब इंजन स्टार्ट होता है । तो ओर स्विच को ऑन किया जाता है । जिससे करंट फील्ड कोइल में बहने लगता है ।

ये फील्ड कोइल मैन टर्मिनल से जुड़े रहते हैं । करंट प्रायः स्टार्टर बॉडी के माध्यम से अर्थ होकर निगेटिव प्राप्त करके अपना परिपथ पूरा कर लेता है । प्रायः करंट के कारण फील्ड कोइल मैन आमने सामने समान चुंबकीय ध्रुव बन जाते हैं ।

जिससे ये ध्रुव एक दुसरे को धकेलने का प्रयास करते हैं । तथा इसके विरुद्ध असमान चुंबकीय ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं । इसके कारण जब फील्ड कोइलों के मध्य मैं आर्मेचर को करंट मिलता है ।

तब आर्मेचर मैं फील्ड कोइलों के मध्य घूमने वाला बल पैदा होता है । जिससे आर्मेचर घूमने लगता है । आर्मेचर मैं घूमने की गति ताम्बे के तारों की घुमाव की संख्या और उसमें स्तिथ करंट पर निर्भर रहता है ।

सेल्फ स्टार्टर मैं जो आर्मेचर शाफ़्ट प्रयोग की जाती है । उसके सिरे पर फ्लाई व्हील को घुमाने के लिए एक ड्राइव मेकेनिज़्म का प्रयोग किया जाता है । जब आर्मेचर घूमता है । ये मेकेनिज़्म आगे बढ़कर फ्लाई व्हील को घुमाने लगता है ।

 

 

 

ड्राइव मेकेनिज़्म क्या है

ड्राइव मेकेनिज़्म का प्रयोग सेल्फ स्टार्टर मैं किया जाता है । ये सभी सेल्फ स्टार्टर मैं लगभग एक जैसा ही होता है । ड्राइव मेकेनिज़्म कई प्रकार के प्रयोग किये जाते हैं ।

फ्लाई व्हील और आर्मेचर मैं गियर का प्रयोग किया जाता है । जिनका अनुपात 16:1 होता है । यानी पिनियन के जब 16 चक्कर हो जाते हैं । तो फ्लाईव्हील का एक चक्कर होता है ।

जिससे फ्लाईव्हील को अधिक टार्क मिलता है । और जब इंजन चलता है । तो इनका सम्बन्ध टूटना आवयश्यक हो जाता है । नहीं तो अगर इंजन की गति के साथ आर्मेचर भी घूमने लगे तो कंप्यूटेटर सिग्मेंट तथा कनेक्शन के टूटने का भय रहता है । 

 

ड्राइव मेकेनिज़्म कितने प्रकार के होते हैं 

चलिए जानते हैं कि ड्राइव मेकेनिज़्म कितने प्रकार के होते हैं हम यहाँ कुछ प्रकार का वर्णन कर रहे हैं । जो निम्नलिखित हैं –

  • एक्सियल सेल्फ स्टार्टर 
  • लीवर ड्राइव मेकेनिज़्म 
  • बेन्डेक्स ड्राइव 

सोलेनॉयड स्विच क्या है

सोलेनॉयड स्विच का प्रयोग सेल्फ स्टार्टर मैं किया जाता है । एक सेल्फ स्टार्टर दिद्युत यंत्रों मैं सबसे ज्यादा करंट लेकर घूमता है । इसी के कारण इसे बैटरी से जोड़ने के लिए मोटे ताम्बे के तारों का प्रयोग किया जाता है ।

जिससे इसमें सामान्य स्विच काम नहीं करता है । इसलिए इसमें एक अलग प्रकार के स्विच का प्रयोग किया जाता है । जिसे हम सोलेनॉयड स्विच के नाम से जानते हैं 

 

 

 

इस पोस्ट मैं आपने जाना कि सेल्फ स्टार्टर क्या होता है । और ये किस प्रकार कार्य करता है ।आपको ये पोस्ट कैसी लगी अपने सुझाव हमें कमेंट बॉक्स में भेजें । और इस पोस्ट को औरों के साथ भी साझा करें और हमें

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